उपनिवेशवाद भारत और विश्व

उपनिवेशवाद का प्रथम चरण या सुरुवाती दौर:
उपनिवेशवाद के प्रथम चरण जिसकी शुरुआत प्लासी के युद्ध के बाद होती है । इसमें ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय व्यापार पर पूर्ण रूप से कब्जा कर लिया । उपनिवेशवाद के प्रथम चरण में कंपनी, ब्रिटेन तथा यूरोप के अन्य देशों में कम कीमत पर तैयार भारतीय माल का निर्यात कर अच्छी कीमत वसूला करती थी ।

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उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद में फर्क: अंतर:__उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद दोनों एक राष्ट्रीय सामूहिकता की संप्रभुता को दबाने पर आधारित हैं प्रमुख देश के कुलीन वर्ग के निकाले जाने वाले या भूस्थिर हितों के पक्ष में, लेकिन इससे परे दोनों प्रकार की शक्ति का प्रयोग कुछ अलग तरीके से किया जाता है.

सामान्य तौर पर, उपनिवेशवाद उपजाऊ क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने के लिए, साथ ही साथ दासता या अर्ध-दासता के माध्यम से लोकप्रिय वर्गों का शोषण करने के लिए क्रूर बल पर आधारित है। साम्राज्यवाद में, यह वर्चस्व उस बहाने के तहत अधिक प्रच्छन्न हो सकता है जो प्रत्येक व्यक्ति को पेश की जाने वाली नौकरियों की पेशकश करने या न करने की स्वतंत्रता है और व्यापारी सौदे जिसके लिए वह अपनी स्पष्ट हीनता की स्थिति से चुन सकता है.

किसी भी स्थिति में, प्रमुख अभिजात वर्ग अपने देश और मूल के बीच पहले से मौजूद भौतिक असमानताओं का उपयोग करते हैं नई असमानताएँ पैदा करना अन्य देशों के शोषण और सीमाओं के तंग नियंत्रण के माध्यम से.

1. दोनो में रणनीतिक भेद हैं

2. राजनीतिक सत्ता के नियंत्रण का भेद है 

3.साम्राज्य शब्द सैनिक राज्य संबंधी तथा उपनिवेश शब्द निवेश संबंधी अवधारणा के शाब्दिक अर्थ देता है।

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परिभाषा:परिभाषा : किसी समृद्ध राष्ट्र द्वारा अपने विभिन्न आर्थिक हितों को साधने के लिए निर्बल किंतु प्राकृतिक रूप से संपन्न राष्ट्र को सक्ति के बल पर प्रभाव जमाना।प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष  रूप से सत्ता स्थापित करना।
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शिकार देश: अनेक अफ्रीकी देश, एशिया में भारत चीन और पड़ोसी देश,यूरोप के पिछड़े देश
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साम्राज्यवादी ताकतों के उदय के कारण:
अतिरिक्त पूंजी का होना : औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप यूरोप के देशों में धन का अत्यधिक संचय हुआ। इस अतिरिक्त संचित पूंजी को यदि वहीं यूरोप के देश में पुनः लगाया जाता तो लाभ बहुत कम मिलता जबकि पिछड़े हुए देशों में श्रम सस्ता होने से और प्रतियोगिता शून्य होने से अत्यधिक लाभ की संभावना थी। इसी कारण पूंजी को उपनिवेशों में लगाने की होड़ प्रारम्भ हुई।

2. कच्चे माल की आवश्यकता : यूरोपीय देशों की अपने औद्योगिक उत्पादन के लिए कच्चे माल और अनाज की जरूरत थी जैसे कपास, रबर, टिन, जूट, लोहा आदि। अतः ये औद्योगिक देश औपनिवेशिक प्रसार में लग गये जहां से उन्हें सुगमतापूर्व सस्ते दामों में यह कच्चा माल मिल सके।

3. बाजार की आवश्यकता : औद्योगिक देशों को अपने निर्मित माल की बिक्री के लिये एक बड़े बाजार की जरूरत थी ऐसे में नये बाजारों की खोज के तहत उपनिवेश बनाये गये। अब यह कहा जाने लगा कि बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन करने वाले राज्यों का अपना औपनिवेशिक साम्राज्य होना चाहिए जहां मनमाने ढंग से एकाधिकार की स्थिति में अपना माल बेचा जा सके।

4. तकनीकी विकास : यूरोप में हुये तकनीकी विकास ने रेलवे, डाक-तार, टेलीफोन आदि के माध्यम से देश और काल पर अभूतपूर्व विजय प्राप्त की। नवीन संचार साधनों के जरिए उपनिवेशों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना संभव हो पाया। इतना ही नहीं अनेक स्थानों पर यातायात के साधनों के विकास को लेकर साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा भी शुरू हो गई।

5. जनसंख्या का आधिक्य : 19वीं सदी में यूरोप में बढ़ती हुई जनसंख्या ने औद्योगिक देशों को चिन्ता में डाल दिया। इस बढ़ती आबादी से रोजगार और आवास की समस्या पैदा हुई इस समस्या के समाधान के रूप में यह विचार दिया गया कि उपनिवेशों की स्थापना कर वहां सैनिक शासकीय अधिकरियों के रूप में लोगों को बसा दिया जाए।

6. राष्ट्रीय गौरव की स्थापना : कुछेक यूरोपीय देशजिनका औद्योगिक आर्थिक विकास अपेक्षाकृत कम था कि फिर भी उन्होंने औद्योगिक विकास के विस्तार में रूचि दिखाईजैसे इटली और रूस। वस्तुतः इन देशों ने राजनीतिक उद्देश्य से परिचालित होकर राष्ट्रीय गौरव में वृद्धि करने के लिए औपनिवेशिक विस्तार की नीति अपनाई। इटली ने अपना राष्ट्रीय महत्व बढ़ाने के लिए लीबिया पर अधिकार कर लिया तो मिस्त्र में इंग्लैण्ड और फ्रांस के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी।

7. ईसाई मिशनरियों की भूमिका : यूरोपीय ईसाई मिशनरियों ने धर्म प्रचार के उद्देश्य से औपनिवेशिक विस्तार को जायज ठहराया। इस संदर्भ में इंग्लैण्ड के डॉ॰ डेविड लिंगस्टोन का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जिसने अफ्रीका में जैम्बेजी और कांगो नदी क्षेत्रों की खोज कर अफ्रीका में ईसाई धर्म के प्रचार प्रसार के साथ अपने देश के राजनैतिक, आर्थिक साम्राज्य की वृद्धि के लिए प्रयत्न किया।
साम्राज्यवादी ताकतों का प्रभाव:
1.दास व्यापार
2. कच्चे मॉल और पदार्थों की लूट
3.शोषण
4. बदतर होता जीवन
साम्राज्यवाद के साधन:--


*सांस्कृतिक साम्राज्यवाद,
*आर्थिक साम्राज्यवाद
* सैनिक साम्राज्यवाद

मुख्य साम्राज्यवादी देश  :
स्पेन और पुर्तगाल ने तमाम देशों की खोज कर वहां अपनी व्यापारिक चौकियाँ स्थापित की। धीरे-धीरे फ्रांस और इंग्लैण्ड ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया। इंग्लैण्ड का औपनिवेशिक साम्राज्य सम्पूर्ण विश्व में स्थापित हो गया। 19वीं शताब्दी में इस साम्राज्यवाद ने नवीन रूप धारणा किया। अमरीका एक समय खुद शिकार था बाद में वो शिकारी बन गया।
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साम्राज्यवाद का अंत: हिरोसीमा नागासाकी बम विषफोट के बाद और अमेरिका इंग्लैंड के दबाव में जब जापानी राजा हीरोहितो ने 15अगस्त 1945को अपना भाषण रिकॉर्ड कराया जो पांच दिन बाद यानी 20अगस्त को प्रसारित हुआ ये पांच दिन ही एशिया में साम्राज्यवाद के खात्मे के अंतिम दिन थे पूरे विश्व में मैसेज गया की लोग अब शांति और स्वतंत्रता चाहते हैं। और इस उपनिवेशिक आपाधापी का अर्थ पृथ्वी की तबाही के अलावा कुछ नहीं।

:विकास तंवर खेड़ी

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